रास्ता है
खराब,
और मजबूरी है
जनाब,
चलना उसी पे है
|
काँटे बेहिसाब,
मंज़िल है
कोसों दूर,
पाना उसी को है
|
नफरत चारों ओर,
प्यार नदारद
हुज़ूर
ढूंढना उसी को
है |
पराये मिले सब
ओर
अपने दिल से
दूर,
करीब लाना
उन्ही को है
अपना दिल साफ,
औरों से ही दरकार,
निभाना उन्ही
को है |
निराशा
फैली चारों ओर,
आशा छिपी कहीं
ओर,
ढूंढ के लाना
उसी को है |
रिश्तों
की कडवाहट घनी
जीवन मूल्य
बिड़ला,
तलाशना उसी को
है |
अहम का वट
व्रुक्ष बढ़ रहा ,
अपनो के लिये
समय नहीं ,
पाना एक
ही को है |
(प्रकाशित :केसर (पंजाब) २०१४ पृ .
७२)
-राजेश सोनी
"राज"
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