Friday, 29 March 2013

साथ


अधुरा ही सही पर हमें ये सिला मिला ,
हर शख्श अपने में रमा मिला।
फुर्सत से सुनी थी कभी जिनकी दास्ताँ,
हाल-चाल मेरे पूछने का उन्हें समय न मिला।
साथ सबके है पर वो शख्स तनहा मिला,
समाया सब में  पर वो सबसे जुदा मिला।
मंजिल की तलाश में  मगशूल  है सब,
सोचा कुछ पल बाट लूं,पर वो अपने में फ़िदा मिला।
जानकर  सब अब ठान लिया है " राज " ,
हो अगर अपने में मस्त गर , सब कुछ तुझे है मिला।
न कर किसी की तू परवाह ,
फकीरी मैं ही अपनी सबको  तू साथ मिला।
(प्रकाशित :कीर्ति कलश (नागपुर), अंक६ जून - अगस्त १३, पृ .२३) 
-राजेश सोनी "राज"

Tuesday, 12 March 2013

साथ

सोचा था मखमली कालीन होगा,
राहें मंजिल में मगर शूल मिलें।
अदद साथ पाने की हसरत थी ,
मगर लोग अपने मैं मगशूल मिलें।
सोचा था व्यवहार उनका  शालीन होगा,
मिजाज उनके मगर रूखे मिलें।
लुटा दिया सर्वस्व अपनों पर हमने ,
जब भी तलाशा तो लोग पराये मिलें।
उठती है टीस दिल मैं हमेशा,
कब आयेगा वो दिन जब दिल से दिल  मिलें।
बस एक आवाज देने पर,
सारे लोग सब अपने साथ मिलें।
(प्रकाशित :जर्जर कश्‍ती  (aligarh) डिसेंबर-१३ पृ .१४)
-राजेश सोनी "राज"



Friday, 1 March 2013

" जिंदगी " एवं " तलाश "

प्रिय मित्रो,
एक लघु अन्तराल के बाद फिर आपसे मुखातिब हूँ।
अपनी प्रकाशित कृतियों के बारे में आपसे जिक्र करूँगा।

" जिंदगी " में प्रथम बार अपनी रचनाओ को एक पुस्तक का आकर दे आपका स्नेह पाया था। मैं आभारी हूँ उनका जिन्होंने प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से मेरी हौसला  अफजाई की। इसी आशीर्वाद के हीकारण  मैं जल्द ही दूसरे काव्य संकलन " तलाश " के द्वारा आपके सन्मुख पुनः आया।इस काव्य संकलन के द्वारा मैंने अपनी दिल की बात आप लोगो से बांटी,तथा इस बार भी आपकी अमूल्य राय से अवगत हुआ। यही मेरे निरंतर आगे बढ़ने का संबल बना और मेरीकाव्य  यात्रा अनवरत चलती  रही। दोनो संकलन के  मुखपृष्ट हाज़िर है। शेष फिर। धन्यवाद।