अधुरा ही सही पर हमें ये सिला मिला ,
हर शख्श अपने में रमा मिला।
फुर्सत से सुनी थी कभी जिनकी दास्ताँ,
हाल-चाल मेरे पूछने का उन्हें समय न मिला।
साथ सबके है पर वो शख्स तनहा मिला,
समाया सब में पर वो सबसे जुदा मिला।
मंजिल की तलाश में मगशूल है सब,
सोचा कुछ पल बाट लूं,पर वो अपने में फ़िदा मिला।
जानकर सब अब ठान लिया है " राज " ,
हो अगर अपने में मस्त गर , सब कुछ तुझे है मिला।
न कर किसी की तू परवाह ,
फकीरी मैं ही अपनी सबको तू साथ मिला।
(प्रकाशित :कीर्ति कलश (नागपुर),
अंक६ जून - अगस्त १३, पृ .२३)
-राजेश सोनी
"राज"
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