Sunday, 30 November 2014

ग्लोबल वार्मिंग

ग्लोबल वार्मिंग ने सारा मौसम बिगाड दिया,
ज़मीन, आसमान , पानी सब खराब कर दिया |
सांस  लेने को भी शुद्ध हवा नसीब नहीं., 
खुदगर्ज़ी में कुदरत को भी ललकार दिया |

चैत जाये गर अब भी, सब ठीक हो जाएगा,
प्रकृति का बिगडा संतुलन सुधर जाएगा |
खुद का जीवन तो सुधरेगा ही,
आने वाली पीढी का भी भला हो जाएगा |

नही चैते गर अब भी, कुछ नहीं बचेगा,
मानव अनुकूल मौसम धरा पे नहीं बचेगा |

पीने को स्वच्छ पानी नहीं, सांस के लिये वायु नहीं,
बाड़ ,सूखा, बिखरा कालचक्र, कुछ नहीं बचेगा |
होंगे इन सबके लिये हम स्वयम ही जिम्मेदार,

हरियाली कम, प्रदूषित पानी, प्रदूषित धरा हमने की,
प्रकृति की चेतावनी भी हमने अनसुनी की,

रहेंगे गुनहगार आने वाली पीढी के जब उनके लिये कुछ नहीं बचेगा |
                           -राजेश सोनी "राज"




Thursday, 27 November 2014

बॉन्साई

जो थे उन्हे काट दिया,
जंगलों को साफ कर दिया |
जब पूछेगी आने वाली पीड़ी,
बॉन्साई को तैयार कर दिया |

-राजेश सोनी "राज"

छणिकाए

बस्तियाँ बनाने मे पेडो की मिटा दी हस्ती,
सडके बनाने मे राही सही कसर कर दी पूरी |
स्वार्थ की खातिर जंगल कर दिये तबाह ,
अपनी कब्र खुद खोदने की मानव ने तैयारी कर ली पूरी 

              -राजेश सोनी "राज"

जाता क्या है

दिल को बहलाने मे जाता क्या हे,
हालत को बदलने मे जाता क्या हे |
लोग मिल जायेंगे खुद-ब-खुद,
अपने को आज़माने मे जाता क्या हे |


है गुमान दुनिया को समझने का,
खुद अपने को समझने मे जाता क्या है |
लगते रहे इल्ज़ाम दूसरों पे अब तलक,
ज़रा अपने मे झाकने मे जाता क्या है |

कब से बैठे  है तन्हाँ, ज़िंदगी कि राह में 
दूसरों को साथ लाने मे जाता क्या है |
नहीं है कोई साथ अपने,तो सोचें ज़रा 
अपने को ज़माने के साथ लाने मे जाता क्या है |


गौर से देख, दूसरों से कितना पिछड गया है,
वक़्त के साथ अपने को ढालने मे जाता क्या हे |
क्यूं है परेशान दूसरों की कड़वाहट से,
दो बोल मीठे बोलने मे जाता क्या है |

हर एक बात को दिल पे लेगा, टूट जायेगा,
छोटी मोटी बात नज़रअंदाज़ करने मे जाता क्या है |
मत लगा गैरों से उम्मीदें ए "राज़",
अपने पे भरोसा करने मे जाता क्या है |

-राजेश सोनी "राज"

Tuesday, 18 November 2014

जीवन की आपाधापी में

हँसना रोना भूल गये,
जीवन की आपाधापी   में |
खटते रहे सुब्हो-शाम ,
जीवन की आपाधापी में|
हुए चेतनाशून्य हम,
जीवन की आपाधापी में |
कुदरती जीवन छोड़ दिया,
मशीनी जीवन हुआ आपाधापी में,
करवाया इंज़ार अपनो को,
बस काम याद रहा आपाधापी में
सुविधाएं तो जुटा ली अपार हमने,
उपभोग भूले आपाधापी मैं |
कैलेण्डर तो याद रहा काम के लिये,
त्योहार भूले आपाधापी में |
बाज़ारीकरण के इस दौर में,
मोलभाव सीखा आपाधापी में |
भावनाएं बिसरा दी हमने-
खुदगर्ज़ी पनपा दी आपाधापी में |
गेरों में मशगूल हो गये,
भूल गये अपनों को आपाधापी में |
सरलता तज दी बहुत पहले-
असहज हो गये आपाधापी में |
हँसना रोना भूल गये,
जीवंन की आपाधापी में |
-राजेश सोनी "राज"

मंज़िल

राहें मंज़िल जो चला होगा
निश्चित ही वो छला होगा |
गर की होगी अमृत की लालसा,
उसे गरल ही मिला होगा |

प्यार लुटाया प्यार पाने को,
हर कदम पे धोखा मिला होगा |
विश्वास कर लिया सहसा उस पे,
जो दो कदम भी साथ छला होगा |

मौसम के साथ उसका मिज़ाज़ मनचला होगा,
दिल लगाकर जो दिलजला होगा |
हुआ होगा सुकून अपने परवानेपन पर,
रात भर जो शमा के साथ जला होगा |
(प्रकाशित :शुभ  प्रभात (सागर) २०१३ पृ .६६)

_राजेश सोनी "राज"

Sunday, 16 November 2014

धूप

नर्म मुलायम, सुबह की-,
गुलाबी धूप,
मेरी देहरी को-,
लांघकर,
रोज़ाना मेरे पास आती है |
मेरे मस्तिष्क, मेरे हृदय में-
चेतना का एक स्पंदन 
जगाती है |
करती है हलचल सुनहरी धूप-
यादों के कोहरे को,
अपनी आभा से भगाती है |
करती है अठखेलियाँ,
मेरे विचारों की श्रंखला से,
एक नई आशा की किरन,
रात को निराश हुए मन को,
दिखलाती हे ||
-राजेश सोनी "राज"

Saturday, 15 November 2014

रास्ता

रास्ता है खराब,
और मजबूरी है जनाब,
चलना उसी पे है |

काँटे बेहिसाब,
मंज़िल है कोसों दूर,
पाना उसी को है |

नफरत चारों ओर,
प्यार नदारद हुज़ूर 
ढूंढना उसी को है |

पराये मिले सब ओर 
अपने दिल से दूर,
करीब लाना उन्ही को है 

अपना दिल साफ,
औरों से ही दरकार,
निभाना उन्ही को है |

निराशा  फैली चारों ओर,
आशा छिपी कहीं ओर,
ढूंढ के लाना उसी को है |

रिश्तों  की कडवाहट घनी 
जीवन मूल्य बिड़ला, 
तलाशना उसी को है |

अहम का वट  व्रुक्ष बढ़  रहा ,
अपनो के लिये  समय  नहीं ,
पाना एक  ही  को है |
(प्रकाशित :केसर (पंजाब) २०१४ पृ . ७२)
-राजेश सोनी "राज"