Tuesday, 18 November 2014

जीवन की आपाधापी में

हँसना रोना भूल गये,
जीवन की आपाधापी   में |
खटते रहे सुब्हो-शाम ,
जीवन की आपाधापी में|
हुए चेतनाशून्य हम,
जीवन की आपाधापी में |
कुदरती जीवन छोड़ दिया,
मशीनी जीवन हुआ आपाधापी में,
करवाया इंज़ार अपनो को,
बस काम याद रहा आपाधापी में
सुविधाएं तो जुटा ली अपार हमने,
उपभोग भूले आपाधापी मैं |
कैलेण्डर तो याद रहा काम के लिये,
त्योहार भूले आपाधापी में |
बाज़ारीकरण के इस दौर में,
मोलभाव सीखा आपाधापी में |
भावनाएं बिसरा दी हमने-
खुदगर्ज़ी पनपा दी आपाधापी में |
गेरों में मशगूल हो गये,
भूल गये अपनों को आपाधापी में |
सरलता तज दी बहुत पहले-
असहज हो गये आपाधापी में |
हँसना रोना भूल गये,
जीवंन की आपाधापी में |
-राजेश सोनी "राज"

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