हँसना रोना भूल
गये,
जीवन की आपाधापी में |
खटते रहे सुब्हो-शाम ,
जीवन की आपाधापी में|
जीवन की आपाधापी में|
हुए चेतनाशून्य
हम,
जीवन की
आपाधापी में |
कुदरती जीवन
छोड़ दिया,
मशीनी जीवन हुआ
आपाधापी में,
करवाया इंज़ार
अपनो को,
बस काम याद रहा
आपाधापी में
सुविधाएं तो
जुटा ली अपार हमने,
उपभोग भूले
आपाधापी मैं |
कैलेण्डर तो
याद रहा काम के लिये,
त्योहार भूले
आपाधापी में |
बाज़ारीकरण के
इस दौर में,
मोलभाव सीखा
आपाधापी में |
भावनाएं बिसरा
दी हमने-
खुदगर्ज़ी पनपा
दी आपाधापी में |
गेरों में
मशगूल हो गये,
भूल गये अपनों
को आपाधापी में |
सरलता तज दी
बहुत पहले-
असहज हो गये
आपाधापी में |
हँसना रोना भूल
गये,
जीवंन की
आपाधापी में |
-राजेश सोनी
"राज"
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