Sunday, 16 November 2014

धूप

नर्म मुलायम, सुबह की-,
गुलाबी धूप,
मेरी देहरी को-,
लांघकर,
रोज़ाना मेरे पास आती है |
मेरे मस्तिष्क, मेरे हृदय में-
चेतना का एक स्पंदन 
जगाती है |
करती है हलचल सुनहरी धूप-
यादों के कोहरे को,
अपनी आभा से भगाती है |
करती है अठखेलियाँ,
मेरे विचारों की श्रंखला से,
एक नई आशा की किरन,
रात को निराश हुए मन को,
दिखलाती हे ||
-राजेश सोनी "राज"

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