नर्म मुलायम,
सुबह की-,
गुलाबी धूप,
मेरी देहरी को-,
लांघकर,
रोज़ाना मेरे
पास आती है |
मेरे मस्तिष्क,
मेरे हृदय में-
चेतना का एक
स्पंदन
जगाती है |
करती है हलचल
सुनहरी धूप-
यादों के कोहरे को,
अपनी आभा से भगाती है |
करती है
अठखेलियाँ,
मेरे विचारों
की श्रंखला से,
एक नई आशा की किरन,
रात को निराश हुए
मन को,
दिखलाती हे ||
-राजेश सोनी
"राज"
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