जब्त
है दास्तान चिलमन कि, जो है आग़ोश में किसी के,
खुदा जाने कितनी मुश्किल से जब्त करता है।
जवाब
पहली पहली नज़र जो मिली
उनसे,
मुद्दतों से मिलने का सबब
याद आया |
सवाल करने चले थे खुद से
ही वो,
खुद को खुद का ही जवाब
याद आया ||
पछतावा
कहने को तो कह देते है
वो,
हमे तुमसे प्यार नहीं |
फिर इस कदर पछताते है बस-
पूछो ही मत ||
निगाहें
हमने जब भी कोई बात कहनी
चाही,
तो निग़ाह उसने झुका ली |
जब हमने निग़ाह हटा ली,
तो उसने सारी बात कह डाली
||
चांद
करो ना बात ज़रा दीदार तो
करने दो,
रात का चांद मेरी छत पे
उतर आया है |
आग़ोश-ए-मुहब्बत मे
बांधना चाहा था -
मगर वो क़हर ढाने पे उतर
आया है ||
प्रकाशित-सामाजिक आक्रोश
16-1-2007
