आओ यारों फलक तक घूम आयें,
अपने होंसलों को पर लगा आयें |
डूबकर समंदर में, मोती ढूंढ लायें,
सुनहली आशा के सपने बुन लायें|
दूसरों के होंठो पे दे मुस्कान,
ज़िंदगी को इक नया आयाम दे आयें |
फंस चुके जो निराशा के दलदल में,
चलो आज उनको हम मुक्त करायें |
थाम उमंग, उल्लास का दामन -
घर-घर दीपावली हम मनवा आयें |
कौन कहता है आज सब दूर है हिंसा-
प्रेम के अंकुर को थोडा हवा पानी दे आयें |
गुम हो चुके रिश्तो की तलाश में-
थोडा और दूर तक हम निकल जायें |
बदल दे कायनात को अपनी मेहनत से,
भाईचारे, प्यार मोहबत की फसल लहलहायें |
(प्रकाशित :जनप्रवाह(ग्वालियर) १२-१८ जुलाइ २००९
पृ.५)
-राजेश सोनी "राज"
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