Friday, 5 December 2014

फलक

आओ यारों फलक तक घूम आयें,
अपने होंसलों को पर लगा आयें |
डूबकर समंदर में, मोती ढूंढ लायें,
सुनहली आशा के सपने बुन लायें|
दूसरों के होंठो पे दे मुस्कान,

ज़िंदगी को इक नया आयाम दे आयें | 
फंस चुके जो निराशा के दलदल में,
चलो आज उनको हम मुक्त करायें |
थाम उमंग, उल्लास का दामन -
घर-घर दीपावली हम मनवा आयें |
कौन कहता है आज सब दूर है हिंसा-
प्रेम के अंकुर को थोडा हवा पानी दे आयें |
गुम हो चुके रिश्तो की तलाश में-
थोडा और दूर तक हम निकल जायें |
बदल दे कायनात को अपनी मेहनत से,
भाईचारे, प्यार मोहबत की फसल लहलहायें |
(प्रकाशित :जनप्रवाह(ग्‍वालियर) १२-१८ जुलाइ २००९ पृ.५)

-राजेश सोनी "राज"

शहर

जाने ये मेरे शहर को क्या हो गया है,
संवेदनाओं को रख परे ये सो गया है |
पड़ोसियों को खबर ही नहीं पर,
सारे शहर में ढिंढोरा हो  गया है |
काल छोटी सी बात पर था कत्लेआम,
लोगो का सब्र जाने कहाँ खो  गया है |

अमन-शांती, भाई-चारा बीती बात,
मुखौटे  लगाना फैशन सा हो गाया है |
सारी रात घूमते थे  कभी बैखौफ,
शाम होते ही सन्नाटा हो गया हे |
जाने ये मेरे शहर को क्या हो गया है |
संवेदनाओ को रख परे ये सो गया है |
अनजानो की बातें करे क्या,
भाई का भाई ही दुश्मन हो गया है |
क्या करे तुलना किसी की किसी से,
कहने को शह्र महानगर हो गया है |
क्या फिर से चलेगी वो पुरवाई,
दिल से दिल फिर मिल जायेगा |
अपने दिल की बात कर सकेगा कोई,
शहर सही मायने मे शहर हो जायेगा |
(प्रकाशित :दिव्य दृष्टि (दुर्ग, छत्तीसगड  ) २०१२,पृ .१२६)

-राजेश सोनी "राज"

Wednesday, 3 December 2014

अमन नहीं है



नसीब में मेरे चैन नहीं है।
अमन की बात करते है सब -
पर अमन नहीं है।
पतझड़ को लाख भुला दे हम ,
गुलशन में तेरे रब !
अब अमन नहीं है।
तसल्ली दे दिये जा रहे है,
जोड़ दे दिलों को दिलों से -
अब वो पवन नहीं है।
फिर कब होगी वो सुबह -
खिल जायेगा बागवां फूलों से ,
रात में वो गुजर नहीं है।
कब से निहार रहे है एकटक राहें -
दिक् को सुकून देने वाले ,
रहबर नहीं है।
प्रकाशित :

हिमखण्ड (हिमाचल प्रदेश) जून २००७ (पृ ११)
-राजेश सोनी "राज"