Friday, 25 January 2013

आओ गणतंत्र दिवस मनाएं

आओ गणतंत्र दिवस मनाएं ,
सत्य-अहिंसा को अपनाएं।
देश-प्रेम को सर्वोपरि रख,
गणतंत्र को गुणतंत्र बनायें।

सेवा-समर्पण की भावना अपनाएं ,
दिलों से अपने नफरत हटायें।
जन-मानस में एकता बढ़ाएं ,
गणतंत्र को गुणतंत्र बनायें।

मजहबों की दीवार गिराएँ,
मनावत को ध्येय बनायें।
मानवीय मूल्यों को बचाएं,
गणतंत्र को गुणतंत्र बनायें।
-राजेश सोनी "राज"

तिरंगा

हमारी जान है तिरंगा ,
हमारी शान है तिरंगा।
हमारी आन  है तिरंगा ,
है हमारे दिलों में तिरंगा।
केशरिया रंग शौर्य से रंगा ,
श्वेत शांति का प्रतीक।
हरियाली हरा रंगा ,
चक्र उन्नति का जरिया।
आज़ादी का करता बखान तिरंगा ,
है सबसे ऊपर तिरंगा।
सबका प्यारा,सबका दुलारा तिरंगा,
शत-शत नमन तिरंगा।
-राजेश सोनी "राज"

Tuesday, 22 January 2013

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं।

प्रिय मित्रो,
सादर वन्दे।
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं।
भारत के संविधान की गौरवशाली वर्षगाठ पर हमें सोचने का , गर्व करने का  समय आया है।
हम अपनी जिम्मेदारी निभाते जाएँ, यह सोचकर की हम बदलेंगे युग बदलेगा।
यदि हम सभी की यही विचार-धारा रही तो निश्चित तौर पर हमें तरक्की के पथ से कोई नहीं डिगा सकता।
जय हिन्द-जय भारत।

Monday, 21 January 2013

अमन नहीं है।



नसीब में मेरे चैन नहीं है।
अमन की बात करते है सब -
पर अमन नहीं है।
पतझड़ को लाख भुला दे हम ,
गुलशन में तेरे रब !
अब अमन नहीं है।
तसल्ली दे दिये जा रहे है,
जोड़ दे दिलों को दिलों से -
अब वो पवन नहीं है।
फिर कब होगी वो सुबह -
खिल जायेगा बागवां फूलों से ,
रात में वो गुजर नहीं है।
कब से निहार रहे है एकटक राहें -
दिल को सुकून देने वाले ,
रहबर नहीं है।
(प्रकाशित :हिमखण्ड (हिमाचल प्रदेश) जून २००७ (पृ ११))
-राजेश सोनी "राज"

जज्बात

कागज कलम दवात ला ,
मन में अच्छे ख़यालात ला।
पा जाये मंजिल को आखिर ,
कुछ ऐसे हालात ला।
हौसला  हरदम बढ़ता रहे,
दिल में ऐसे जज्बात ला।
औरों के लबो पे हो मुस्कान ,
खुशियों की ऐसी बरसात ला।
सब मानेंगे तुझको को खुद-  - खुद।
अपने अन्दर वो बात ला।
जुड़ जायेगा कारवां अपने आप,
लोगो को अपने साथ ला।
(प्रकाशित :
कामना (बिहार) २०१४ पृ. ९७ 
कीर्ति कलश ( नागपुर), अंक ५ , 

सामाजिक आक्रोश (सहारनपुर) १६।११।२०१२,पृ .४ )
-राजेश सोनी "राज"

देखो कैसे मुखोटा ओढ़ रहा है आदमी


देखो कैसे मुखोटा ओढ़ रहा है आदमी,
पल-पल रंग  कैसे बदल रहा आदमी।
उड़ा रहा धज्जियाँ उसूलों की ये आदमी ,
छुपा गहरे राज सीने में मुस्करा रहा आदमी।
ऊपर से प्यार दिखा, कर रहा वार आदमी ,
अपने झूठे अहम् को ढो रहा आदमी।
अपनी तरक्की से खुश नहीं आदमी ,
दुसरो की तरक्की से जलभुन रहा आदमी।
पता नहीं  दुनिया से कहाँ खो गई इंसानियत ,
अवसर की तलाश में गिर गया है आदमी।
महसूसता था दर्द खुद मैं ,दुसरो के कराहने मैं,
अब खुश हो रहा इन बातों से अब आदमी।
रिश्तों  की मिठास को गुम करता आदमी,
कुदरती जिंदगी से दूर भागता आदमी।
चलता चला जा रहा सुबह-शाम  आदमी,
पता नहीं किस मुकाम पर पहुँच रहा आदमी।
(प्रकाशित : 
राष्ट्र-किंकर (नई-दिल्ली)
सामाजिक आक्रोश (सहारनपुर ) १६।०२।२००९

कान्य कुब्ज (बिजनोर) २००९ , पृ. ८०)
-राजेश सोनी "राज"