Thursday, 27 November 2014

जाता क्या है

दिल को बहलाने मे जाता क्या हे,
हालत को बदलने मे जाता क्या हे |
लोग मिल जायेंगे खुद-ब-खुद,
अपने को आज़माने मे जाता क्या हे |


है गुमान दुनिया को समझने का,
खुद अपने को समझने मे जाता क्या है |
लगते रहे इल्ज़ाम दूसरों पे अब तलक,
ज़रा अपने मे झाकने मे जाता क्या है |

कब से बैठे  है तन्हाँ, ज़िंदगी कि राह में 
दूसरों को साथ लाने मे जाता क्या है |
नहीं है कोई साथ अपने,तो सोचें ज़रा 
अपने को ज़माने के साथ लाने मे जाता क्या है |


गौर से देख, दूसरों से कितना पिछड गया है,
वक़्त के साथ अपने को ढालने मे जाता क्या हे |
क्यूं है परेशान दूसरों की कड़वाहट से,
दो बोल मीठे बोलने मे जाता क्या है |

हर एक बात को दिल पे लेगा, टूट जायेगा,
छोटी मोटी बात नज़रअंदाज़ करने मे जाता क्या है |
मत लगा गैरों से उम्मीदें ए "राज़",
अपने पे भरोसा करने मे जाता क्या है |

-राजेश सोनी "राज"

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