दिल को बहलाने
मे जाता क्या हे,
हालत को बदलने
मे जाता क्या हे |
लोग मिल
जायेंगे खुद-ब-खुद,
अपने को
आज़माने मे जाता क्या हे |
है गुमान
दुनिया को समझने का,
खुद अपने को
समझने मे जाता क्या है |
लगते रहे
इल्ज़ाम दूसरों पे अब तलक,
ज़रा अपने मे
झाकने मे जाता क्या है |
कब से बैठे
है तन्हाँ, ज़िंदगी कि राह में
दूसरों को साथ
लाने मे जाता क्या है |
नहीं है कोई
साथ अपने,तो सोचें ज़रा
अपने को ज़माने
के साथ लाने मे जाता क्या है |
गौर से देख,
दूसरों से कितना पिछड गया है,
वक़्त के साथ
अपने को ढालने मे जाता क्या हे |
क्यूं है
परेशान दूसरों की कड़वाहट से,
दो बोल मीठे
बोलने मे जाता क्या है |
हर एक बात को
दिल पे लेगा, टूट जायेगा,
छोटी मोटी बात
नज़रअंदाज़ करने मे जाता क्या है |
मत लगा गैरों
से उम्मीदें ए "राज़",
अपने पे भरोसा
करने मे जाता क्या है |
-राजेश सोनी
"राज"
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