देखो कैसे मुखोटा ओढ़ रहा है आदमी,
पल-पल रंग कैसे बदल रहा आदमी।
उड़ा रहा धज्जियाँ उसूलों की ये आदमी ,
छुपा गहरे राज सीने में मुस्करा रहा आदमी।
ऊपर से प्यार दिखा, कर रहा वार आदमी ,
अपने झूठे अहम् को ढो रहा आदमी।
अपनी तरक्की से खुश नहीं आदमी ,
दुसरो की तरक्की से जलभुन रहा आदमी।
पता नहीं दुनिया से कहाँ खो गई इंसानियत ,
अवसर की तलाश में गिर गया है आदमी।
महसूसता था दर्द खुद मैं ,दुसरो के कराहने मैं,
अब खुश हो रहा इन बातों से अब आदमी।
रिश्तों की मिठास को गुम करता आदमी,
कुदरती जिंदगी से दूर भागता आदमी।
चलता चला जा रहा सुबह-शाम आदमी,
पता नहीं किस मुकाम पर पहुँच रहा आदमी।
(प्रकाशित :
राष्ट्र-किंकर (नई-दिल्ली)
सामाजिक आक्रोश (सहारनपुर ) १६।०२।२००९
कान्य कुब्ज (बिजनोर) २००९ , पृ. ८०)
-राजेश सोनी
"राज"
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