Monday, 14 January 2013

एक बार मनाकर तो देख

ज़िन्दगी को गले लगाकर तो देख,
बिसरे पल को याद करके तो देख !
ग़मज़दा न हो मेरे दोस्त नाकामियो से ,
हौसले अपने मंसूबो  में मिलकर तो देख  !
कितना आगे निकल आया मस्ती में ,
दो पल ज़रा संजीदा हो के तो देख !
लग रही है जो मंजिले कोसो दूर  ,
लगन से एक बार दौड़ लगाकर तो देख !
यार-दोस्त ,रिश्ते -नाते खिचे चले आएंगे ,
एक बार तु मुस्करा कर तो देख !
उम्र के सफ़र में जो छूट गया पीछे ,
गिले दूर कर , सबको पास बुला कर तो देख !
वक्त होता नहीं हर पल एक जैसा ,
उसके साथ दौड़ लगाकर तो देख !
क्यूँ होता है मायुस ,गर रूठे है तेरे अपने ,
प्यार से एक बार मनाकर तो देख !
(प्रकाशित :शब्दो की नागफनी (अलीगढ़) २०१२ पृ.४८)
-राजेश सोनी "राज"

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