सोचा था मखमली कालीन होगा,
राहें मंजिल में मगर शूल मिलें।
अदद साथ पाने की हसरत थी ,
मगर लोग अपने मैं मगशूल मिलें।
सोचा था व्यवहार उनका शालीन होगा,
मिजाज उनके मगर रूखे मिलें।
लुटा दिया सर्वस्व अपनों पर हमने ,
जब भी तलाशा तो लोग पराये मिलें।
उठती है टीस दिल मैं हमेशा,
कब आयेगा वो दिन जब दिल से दिल मिलें।
बस एक आवाज देने पर,
सारे लोग सब अपने साथ मिलें।
(प्रकाशित :जर्जर कश्ती (aligarh)
डिसेंबर-१३ पृ .१४)
-राजेश सोनी
"राज"
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