जाने ये मेरे
शहर को क्या हो गया है,
संवेदनाओं को
रख परे ये सो गया है |
पड़ोसियों को
खबर ही नहीं पर,
सारे शहर में
ढिंढोरा हो गया है |
काल छोटी सी
बात पर था कत्लेआम,
लोगो का सब्र जाने कहाँ खो गया है |
अमन-शांती,
भाई-चारा बीती बात,
मुखौटे
लगाना फैशन सा हो गाया है |
सारी रात घूमते
थे कभी बैखौफ,
शाम होते ही
सन्नाटा हो गया हे |
जाने ये मेरे
शहर को क्या हो गया है |
संवेदनाओ को रख
परे ये सो गया है |
अनजानो की
बातें करे क्या,
भाई का भाई ही
दुश्मन हो गया है |
क्या करे तुलना
किसी की किसी से,
कहने को शह्र
महानगर हो गया है |
क्या फिर से
चलेगी वो पुरवाई,
दिल से दिल फिर
मिल जायेगा |
अपने दिल की
बात कर सकेगा कोई,
शहर सही मायने
मे शहर हो जायेगा |
(प्रकाशित :दिव्य दृष्टि (दुर्ग, छत्तीसगड ) २०१२,पृ .१२६)
-राजेश सोनी "राज"
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