Friday, 5 December 2014

शहर

जाने ये मेरे शहर को क्या हो गया है,
संवेदनाओं को रख परे ये सो गया है |
पड़ोसियों को खबर ही नहीं पर,
सारे शहर में ढिंढोरा हो  गया है |
काल छोटी सी बात पर था कत्लेआम,
लोगो का सब्र जाने कहाँ खो  गया है |

अमन-शांती, भाई-चारा बीती बात,
मुखौटे  लगाना फैशन सा हो गाया है |
सारी रात घूमते थे  कभी बैखौफ,
शाम होते ही सन्नाटा हो गया हे |
जाने ये मेरे शहर को क्या हो गया है |
संवेदनाओ को रख परे ये सो गया है |
अनजानो की बातें करे क्या,
भाई का भाई ही दुश्मन हो गया है |
क्या करे तुलना किसी की किसी से,
कहने को शह्र महानगर हो गया है |
क्या फिर से चलेगी वो पुरवाई,
दिल से दिल फिर मिल जायेगा |
अपने दिल की बात कर सकेगा कोई,
शहर सही मायने मे शहर हो जायेगा |
(प्रकाशित :दिव्य दृष्टि (दुर्ग, छत्तीसगड  ) २०१२,पृ .१२६)

-राजेश सोनी "राज"

No comments:

Post a Comment