Wednesday, 3 December 2014

अमन नहीं है



नसीब में मेरे चैन नहीं है।
अमन की बात करते है सब -
पर अमन नहीं है।
पतझड़ को लाख भुला दे हम ,
गुलशन में तेरे रब !
अब अमन नहीं है।
तसल्ली दे दिये जा रहे है,
जोड़ दे दिलों को दिलों से -
अब वो पवन नहीं है।
फिर कब होगी वो सुबह -
खिल जायेगा बागवां फूलों से ,
रात में वो गुजर नहीं है।
कब से निहार रहे है एकटक राहें -
दिक् को सुकून देने वाले ,
रहबर नहीं है।
प्रकाशित :

हिमखण्ड (हिमाचल प्रदेश) जून २००७ (पृ ११)
-राजेश सोनी "राज"


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